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• माहाशिवरात्रि

देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व आवश्यक कृतियां व उनका शास्त्र


`देवालय' अर्थात् देवताका आलय, अर्थात् जहां भगवानका साक्षात् वास है । `कहते हैं, भगवान भावके भूखे हैं ।' देवताके दर्शन किसी भी पद्धतिसे, अपितु भक्तिभावसे करनेसे ईश्वरकृपाकी अनुभूति होती है । सामान्य भक्तमें इतना भाव नहीं होता; उसके लिए देवताके दर्शन (आध्यात्मिक दृष्टिसे) योग्य पद्धतिसे करने आवश्यक हैं । देवताके प्रत्यक्ष दर्शनसे पूर्व स्वयंपर बने रज-तमरूपी कालिखका आवरण दूर कर, अंतरमें भावरूपी ज्योत जगाना आवश्यक है । तब ही ईश्वरसे प्रक्षेपित चैतन्यके प्रकाशका एवं ईश्वरीय कृपा-प्रसादका हमें परिपूर्ण लाभ होता है । देवताके दर्शनकी योग्य पद्धतिद्वारा यह कैसे साध्य होता है, इसकी जानकारी इस लेखमालिकामें प्रस्तुत है । यहां प्रस्तुत योग्य पद्धति व उसके आधारभूत अध्यात्मशास्त्रके सूक्ष्मस्तरीय सिद्धांतोंसे धर्मशास्त्रके प्रति श्रद्धा निर्माण होनेमें सहायता होगी ।

देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व शरीरपर धारण की हुई चर्मकी वस्तुएं क्यों उतार देनी चाहिए ?
`चर्मकी बनी वस्तुआेंसे प्रक्षेपित तमोगुणी तरंगोंके कारण जीवकी देेहके चारों ओर तमोगुणी तरंगोंका कोष निर्माण होता है । इस कोषके कारण देवालयमें व्याप्त सात्त्विकता ग्रहण करनेकी जीवकी क्षमता नष्ट होती है । फलस्वरूप जीवको देवालयकी सात्त्विकताका लाभ कम मात्रामें मिलता है; अत: संभव हो, तो सात्त्विक तरंगोंको अवरुद्ध करनेवाली चर्मकी बनी वस्तुएं धारण कर देवालयके सात्त्विक वातावरणमें प्रवेश नहीं करना चाहिए ।

देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व जूते-चप्पल क्यों उतारें ?
देवालय सामूहिक उपासनाके केंद्र हैं । देवालयसे प्रक्षेपित चैतन्यका अधिकाधिक लाभ पानेके लिए जूते-चप्पल जैसी रज-तमात्मक वस्तुएं पहनकर देवालयमें जाना अनुचित है । इससे भूमिसे पातालतककी प्रवाही तरंगोंका देवालयमें प्रवेश होता है तथा वहांकी सात्त्विकता कम अथवा नष्ट हो सकती है । देवालयकी बाह्य कक्षामें सूक्ष्म स्तरपर पातालसे अधिक संबंधित तरंगोंका प्रादुर्भाव बढ जाता है, जिसके कारण वहां एक प्रकारसे सूक्ष्म पाताल निर्माण होनेकी आशंका रहती है । इसलिए जहांतक हो सके, देवालयमें ऐसी वस्तुएं पहनकर न जाएं ।

देवालयके परिसरमें भी जूते-चप्पल न उतारें; क्योंकि उस परिसरमें देवताआेंकी तरंगें व गण (विशेषत: शिवालयमें शिवजीके गण उपस्थित रहते हैं ।) वहांके परिसरमें विचरते हैं । इस कक्षामें जूते-चप्पल उतारनेसे देेवताकी मूर्तिसे प्रक्षेपित तरंगोंपर रज-तम कणोंका आवरण आ जाता है तथा वहांकी सात्त्विकता कम हो जाती है । इससे जीवको सात्त्विकताका लाभ नहीं मिलता । इसके अतिरिक्त किसी गणके क्रोधित होनेपर जीवको उस गणका कोप भी सहना पडता है तथा कुछ मात्रामें उसकी आध्यात्मिक अधोगति भी होती है । उपरोक्त हानिकी आशंकाके कारण देवालयके प्रांगणमें नहीं; अपितु देवालय-क्षेत्रके बाहर जूते-चप्पल उतारने चाहिए । यदि ऐसा करना सुविधाजनक न हो अथवा देवालय किसी मार्गपर बना हुआ हो, तो देवतासे क्षमा मांगकर ही देवालयमें प्रवेश करें ।

देवालयके प्रांगणमें ही जूते-चप्पल उतारने पडें, तो उन्हें देवालयके सामने उतारना अनुचित
अनेक लोग देवालयके सामने ही जूते-चप्पल उतारते हैं । इस कारण देवालयसे प्रक्षेपित चैतन्य जूते-चप्पलोंसे प्रक्षेपित रज-तमकी सूक्ष्म दीवारके कारण प्रतिबंधित होता है तथा केवल भीतर ही प्रक्षेपित होता है; बाहर प्रक्षेपित नहीं होता । इस कारण देवालयके बाहरके जीवको देवालयसे प्रक्षेपित चैतन्यका लाभ नहीं मिलता । इससे बचनेके लिए देवताके दाहिनी ओर जूते-चप्पल उतारें । देवालयमें समष्टि स्तरका कार्य होता है । इसलिए विशिष्ट देवालयके अधिष्ठित देवताका तारक भाग जागृत रहता है (अर्थात् सूर्यनाडी जागृत रहती है) । इसलिए देवालयके बाह्य भागमें उष्ण तरंगें रहती हैं । इन तरंगोंके कारण देवालयके बाहर उतारे गए जूूते-चप्पलोंसे प्रक्षेपित रज-तमका विघटन होता है । ( जुते-चप्पलोंसे प्रक्षेपित रज-तमके विघटन जैसा कनिष्ठ स्तरका कार्य, देवताके तारक रूपका ही कार्य है । बडी अनिष्ट शक्एतियोंको नष्ट करना देवताके मारक रूपका कार्य है । - संकलनकर्ता)

देवालयमें पैर धोकर ही प्रवेश क्यों करना चाहिए ?
चलते समय पैरोंमें धूलके कण चिपक जाते हैं । पैर बिना धोए देवालयमें प्रवेश करनेसे, धूल कणोंसे प्रक्षेपित रज-तमात्मक तरंगोंके कारण जीवमें देवालयकी सात्त्विकता ग्रहण करनेकी क्षमता कम होती है । साथ ही, वातावरणमें उन रज-तम तरंगोंके प्रक्षेपणसे देवालयकी सात्त्विकता कम होती है । इसके विपरीत, पैर धोकर देवालयमें जानेसे, पैरोंमें लगे धूलिकण धुल जाते हैं और सात्त्विक तरंगें ग्रहण करनेमें अवरोध नहीं आता तथा रज-तमात्मक तरंगोंका प्रक्षेपण कम मात्रामें होनेसे, देवालयकी सात्त्विकताके टिके रहनेमें सहायता मिलती है । (पूर्वकालमें हिंदू, देवालयोंके बाहर बने जलाशयोंमें पैर धोकर देवालयमें प्रवेश करते थे । अब प्राय: देेेवालयोंके बाहर जलाशय नहीं होते; होते हैं तो भी कई लोगोंको पैर धोकर देवालयमें प्रवेश करनेकी जानकारी न होनेके कारण, अर्थात् हिंदुआेंमें धर्मशिक्षाके अभावके कारण वे पैर धोए बिना ही देवालयमें चले जाते हैं । हिंदुआेंके देवालयोंकी सात्त्विकता कम होनेका यह भी एक कारण है । - संकलनकर्ता)

पैर धोनेके उपरांत स्वयंपर जल क्यों छिडकें ?
देवालयमें प्रवेश्.ा करनेसे पूर्व पैर धोएं । उसके उपरांत हाथमें जल लेकर `अपवित्र: पवित्रो वा', कहते हुए अपने संपूर्ण शरीरपर तीन बार जल छिडककर ही देवालयमें प्रवेश करें । इस प्रकार जलमें विद्यमान सर्वशुद्धताके गुणसे जीवके सूक्ष्म-कोष व प्राणमयकोष कुछ शुद्ध होते हैं तथा जीव सात्त्विकता ग्रहण करनेमें सक्षम बनता है । जीवकी देहके आस-पास घूमनेवाली रज-तम तरंगें प्रतिबंधित होकर जीवका बाह्य मंडल सात्त्विकतासे आवेशित होता है ।

कुछ देवालयोंमेंे ऐसा नियम क्यों है कि, `पुरुष अंगरखा (शर्ट) उतारकर देवालयमें प्रवेश करें ?'
कुछ जागृत या स्वयंभू देवस्थानोंकी सात्त्विकता बनाए रखनेके लिए, रज-तमात्मक धूलिकणोंसे आवेशित अंगरखा उतारकर देवालयके गर्भगृहमें प्रवेश कर, तदुपरांत देवताके दर्शन कर उन्हें पूजासामग्री अर्पण करना इष्ट है । इसलिए ऐसे स्थानोंपर केवल पुरुषोंको ही गर्भगृहतक प्रवेश मिलता है । किसी भी कर्ममें स्त्री ही प्रत्यक्ष शक्तिरूपी स्त्रोत होती है तथा पुरुष शिवरूपी कर्ता । इसलिए उनके द्वारा अधिकाधिक सात्त्विकताका अंगीकार करना महत्त्वपूर्ण है । कर्मकांडांतर्गत पूजामें शरीर खुला रखकर केवल शालीनता हेतु धूत अथवा रेशमी वसन (वस्त्र) परिधान करनेकी अनुमति है । इससे पूजाविधिकी पवित्रता दीर्घकालतक बनी रहती है तथा पूजकको उससे निर्मित चैतन्यका लाभ अधिक मिल पाता है ।

देवालयके प्रवेशद्वार, सभामंडप व गर्भगृहमें प्रवेश करनेसे पूर्व द्वारको नमस्कार क्यों करें ?
देवालय देवताके अधिराज्य हैं । इसलिए देवताके गण सूक्ष्मरूपमें प्रवेशद्वारपर खडे रहते हैं । प्रवेशद्वारको नमस्कार करना, अर्थात् देवताके दर्शनके लिए देवालयमें प्रवेश करनेकी अनुमति मांगना ।

देवालय परिसरसे कलश दर्शन क्यों करने चाहिए ?
देवालयमें प्रवेश करनेसे पहले परिसरसे देवालयके कलशके दर्शन करने चाहिए एवं कलशको नमन करना चाहिए । ऐसा करनेसे कलशके अग्रभागसे दूरतक प्रसारित सात्त्विक तरंगें कार्यरत होती हैं तथा दर्शनार्थीको उसका लाभ होता है । जीवकी स्थूलदेहकी चारों ओर सात्त्विक तरंगोंका कवच बन जानेसे देवालयमें प्रवेश करनेपर जीवमें सात्त्विक तरंगोंको अधिकाधिक ग्रहण करनेकी क्षमता निर्माण होती है तथा कलशको देखनेसे जीवमें ईश्वरके प्रति भाववृद्धि होनेमें सहायता मिलती है । (संदर्भ : सनातनका ग्रंथ - `देवालयमें दर्शन कैसे करें ?')

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देवालयमें दर्शनके लिए जाते समय सिर ढकना उपयुक्त है या अनुपयुक्त ?

- डॉ. जयंत आठवलेजीको ध्यानावस्थामें प्राप्त ज्ञान (२९.१०.२००६, दोपहर १.१५)

१. सामान्य दर्शनार्थीके लिए देवालयमें सिर ढककर जाना योग्य है; परंतु जिनका आध्यात्मिक स्तर ५० प्रतिशतसे अधिक है, उनके लिए सिर न ढकना ही योग्य है । इसीलिए कुछ देवस्थानोंमें (उदा. वैष्णोदेवी) दर्शनके लिए जाते समय सिर ढकनेकी परंपरा है । `वैष्णोदेवीके दर्शनार्थी सिरपर लाल रंगका पवित्र वस्त्र बांधते हैं । इसी वस्त्रको `देवीकी चुनरी' कहते हैं । जागृत देवस्थानके परिसरमें, अर्थात् देवस्थानसे एकसे डेेढ किलोमीटरके घेरेमेें प्रचूर मात्रामें आकर्षित दैवी तत्त्वके कारण वातावरणमें सात्त्विकताकी निर्मिति होती है । सात्त्विक वातावरणमें जानेसे जागृत आत्मशक्ति को दीर्घकाल तक टिकाए रखने हेतु ब्रह्मरंध्रपर पवित्र आवरण रखना होता है ।' दर्शनके लिए जाते समय सामान्य पुरुष भक्तोंको सिरपर टोपी पहननी चाहिए अथवा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिए तथा स्त्री भक्तोंको अपना पल्लू सिरपर ओढना चाहिए ।

२. ५० प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरके व्यक्ति सिर न ढकें, तो उनसे प्रक्षेपित चैतन्यका लाभ अन्य लोगोंको भी होता है । धार्मिक विधिके समय यजमान तो टोपी धारण करते हैं; परंतु पुजारी नहीं, इसका कारण इस परंपरासे ज्ञात होता है ।

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देवालयमें दर्शन करनेके लिए प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जानेकी पद्धति


नमस्कार करते हुए जाना
`देवालयके प्रांगणमें ईश्वरकी निर्गुणदर्शक आशीर्वादात्मक तरंगें निरंतर प्रक्षेपित होती रहती हैं । इन तरंगोंका लाभ प्र्राप्त करने हेतु दोनों हाथ जोडकर नमनकी मुद्रामें प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जाएं; परंतु हाथोंको अनाहतचक्रसे सटाए बिना उन्हें शरीरसे थोडा दूर रखें ।

नमस्कारसे लाभान्वित होनेकी प्रक्रिया
हाथके सर्वाधिक संवेदनशील घटक हैं, उंगलियां । इन्हें देवालयकी दिशामें रखनेसे, वहांसे प्रक्षेपित ईश्वरकी निर्गुण तरंगोंका लाभ मिलता है । नमनकी मुद्रामें देवालयमें प्रवेश करनेसे जीवमें तत्त्व ग्रहण करनेकी क्षमता निर्माण होती है । वायुमंडलकी अति सूक्ष्म ऊर्जा ग्रहण न कर पानेवाले भी, उस जीवसे प्रक्षेपित चैतन्यको कुछ मात्रामें ग्रहण कर पाते हैं । ५० प्रतिशतसे अधिक स्तरके जीव यद्यपि नमस्कार किए बिना ही प्रांगणसे देवालयकी ओर बढें, तब भी उन्हें उतना ही ईश्वरीय चैतन्य प्राप्त होगा, जितना नमस्कार करनेसे होता है ।

प्रांगणसे देवालयकी ओर जाते समय भाव कैसा होना चाहिए ?
देवालयके प्रांगणसे देवालयकी ओर जाते समय ऐसा भाव होना चाहिए कि, `अपने परमश्रद्धेय श्री गुरुदेव या प्रत्यक्ष देवतासे भेंट करने जा रहे हैं ।' इससे देवतासे भेंटके लिए जीवमें आवश्यक व्याकुल भावकी निर्मितिमें सहायता होती है । जब कोई शिशु अपनी मातासे मिलनेके लिए आतुर होता है, तब वह यहां-वहां किसी भी वस्तुको नहीं देखता । हमारा ध्यान ईश्वरकी ओर केंद्रित हो, यही उद्देश्य है । इससे ईश्वरकी ओर जाते समय जीवको विनम्र बननेमें सहायता मिलती है । विनम्र भावके फलस्वरूप जीवके प्राणमयकोषमें स्थित सत्त्वकणोंकी प्रबलता होती है ।

देवालयकी सीढियां चढना

देवालयकी सीढियोंको नमन करनेसे क्या लाभ होता है ?
देवालयमें प्रवेशके लिए सीढियां हों, तो चढते समय एक सीढीको दाहिने हाथकी उंगलियोंसे स्पर्श कर नमन करें और आगे बढें । सीढीको नमन करनेसे अर्थात् देवस्थानकी चैतन्यभूमिके चैतन्यको नमन करनेसे, उस भूमिका चैतन्य कार्यरत होता है और जीवको लाभान्वित करता है । ऐसा करनेसे जीवकी देहपर आच्छादित रज-तम कणोंके नष्ट होनेमें सहायता मिलती है । सीढियां जीवको द्वैतसे ईश्वरकी ओर अर्थात् अद्वैतकी ओर ले जाने हेतु एक कडी हैं ।

देवालयकी सीढीको एक हाथसे नमन करना योग्य है क्या ?
चढते समय देवालयकी सीढियोंको एक हाथसे स्पर्श कर नमस्कार करना, अल्पावधिमें संभलकर आगे बढनेकी एक सात्त्विक कृति है । सीढियां चढना एक रजोगुणी कृति है, जिससे जीवकी देहमें रजोगुण कार्यरत होता है । एक हाथ अर्थात् दाहिने हाथकी उंगलियोंसे स्पर्श करनेसे चैतन्यभूमिकी सात्त्विक व शांत तरंगें हाथकी उंगलियोंके माध्यमसे शरीरमें संक्रमित होती हैं और एक प्रकारसे सतत जीवकी देहके रजोगुणपर सूर्यनाडीके माध्यमसे नियंत्रण रखा जाता है । अर्थात् सूर्यनाडीके कार्यका क्षणिक शमन संभव होता है । इस प्रक्रियामें जीवको रजोगुणसे सात्त्विकताका संवर्धन सिखलाया जाता है । इसीलिए तदनुसार योग्य कृति करनी श्रेयस्कर होती है ।

सभामंडपमें प्रवेश करना
सभामंडपमें प्रवेश करनेसे पूर्व सर्वप्रथम द्वारको दूरसे, तदुपरांत सीढियोंको नमस्कार करना : सभामंडपमें प्रवेश करनेसे पूर्व सर्वप्रथम सभामंडपके द्वारको दूरसे, तदुपरांत सभामंडपकी सीढियोंको नमन (स्पर्श) कर आज्ञाचक्रपर हाथ रखें । इसके पश्चात् ही सभामंडपमें प्रवेश करें ।

सभामंडपके द्वारको दूरसे नमस्कार करना : सभामंडपके द्वारको दूरसे नमस्कार करना, अर्थात् देवताके अधिराज्यमें संचारित `रक्षक ईश्वरीय तरंगों' के रूपको प्रार्थनारूपी भावसे नमन कर देवताके अधिराज्यमें प्रवेश करनेके लिए मार्ग मुक्त करनेके लिए निवेदन करना । देवालयके सभामंडप ईश्वरीय नियोजनके प्रत्यक्ष कार्यरूप स्थान होते हैं ।

सभामंडपमें प्रवेश करते समय सीढियोंको हाथसे स्पर्श कर नमस्कार करना : सभामंडपमें प्रवेश करते समय सीढियोंको हाथसे स्पर्श कर नमस्कार करना, अर्थात् समष्टि स्वरूपी कार्य करनेवाले देवालयके सभामंडपकी स्थानमहिमाको नमन करना । वहांके कार्यरूपी तेजके कारण भूमिमें संवर्धित ईश्वरीय चैतन्यको नमन कर उस तत्त्वके माध्यमसे अपनी देहमें चैतन्य ग्रहण करनेकी संवेदनशीलता बढाना । भूमिको हाथ लगाकर नमन करनेसे उस विशिष्ट वातावरणका जडत्वदर्शक चैतन्य, जीवकी देहमें तत्काल संक्रमित होता है । इससे पृथ्वी व आप तत्त्वरूपी देहको वातावरणमें संचारित पोषकता प्राप्त होती है व जीवको उच्च देवताआेंके देवालयमें विद्यमान तीका ऊर्जाका कष्ट नहीं होता ।

सभामंडपमें प्रवेश करते समय प्रार्थना करना : `देवालयके सभामंडपमें पैर रखते समय आगे दी गई प्रार्थना करें - `हे प्रभु, आपकी मूर्तिसे प्रक्षेपित चैतन्यका मुझे पूर्ण लाभ होने दें ।' ऐसी प्रार्थना करते हुए ध्यान देवताके चरणोंपर केंद्रित करना चाहिए । इससे जीवका अहं कम होनेमें सहायता मिलती है ।

सभामंडपसे गर्भगृहकी ओर जानेकी पद्धति

सभामंडपकी बाइंर् ओरसे प्रवेश करनेका कारण : `सभामंडपका वाम (बायां) भाग (मूर्तिकी दाहिनी ओरसे प्रक्षेपित) ईश्वरके सहज चैतन्यका प्रक्षेपण करता है । यह वाम भाग चैतन्यके आधारपर ब्रह्मांडस्तरपर कार्य करनेवाली मूल क्रियाधारा है । इस भागसेे प्रवेश करनेपर जीवको (उसका दाहिना भाग देवताके दाहिने भागकी ओर होनेसे), ब्रह्मांडमें कार्य करनेके लिए प्रक्षेपित तरंगोंका लाभ मिलता है । इससे जीवका शरीर चैतन्य ग्रहण करनेके लिए अधिक पोषक बनता है तथा ईश्वरीय तेजके कारण जीवके मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रोंकी शुद्धि होती है ।

सभामंडपके दाइंर् ओरसे प्रवेश न कर; अपितु वहांसे बाहर निकलनेका कारण : सभामंडपका कुश (दाहिना) भाग (मूर्तिकी बाइंर् ओरसे प्रक्षेपित) ईश्वरके मारक रूपके कार्यरूपसे संबंधित ऊर्जाका प्रक्षेपण करनेवाली क्रियाधारा है । इस भागपर ईश्वरका मारक तेज निरंतर कार्यरत रहता है । अत: इस भागसे प्रवेश करनेपर कम स्तरके जीवको शक्ति सहन नहीं होती व उसे सिरदर्द, आंखोंमें जलन आदि कष्ट होते हैं । अतएव इस भागसे प्रवेश न कर यहांसे देवालयसे बाहर निकलें ।

देवता-दर्शनसे पूर्व आवश्यक कृतियां व उनका शास्त्र

देवालयका घंटा यथासंभव क्यों न बजाएं ?
`प्रत्यक्ष देवताके दर्शन करते समय यथासंभव घंटानाद न करें; क्योंकि घंटानादसे अन्य व्यक्तियोंके ध्यान एवं साधना बाधित हो सकते हैं । घटा नादसे देवालयकी सात्त्विक व शांत तरंगें रजोगुणी तरंगोंमें रूपांतरित होती हैं । इससे जीवको सात्त्विकता कम मिलती है तथा देवालयकी सात्त्विकता भी कम हो जाती है । घटानाद करना ही हो तो अतिमंद स्वरमें व ऐसे भावसे करें मानो मंजुलनादसे देवताको जागृत कर रहे हों ।

देवालयके गर्भगृहमें प्रवेश निषिद्ध होनेका कारण
देवालयके गर्भगृहमें देवताके प्रमुख शक्तिस्त्रोतसे सर्वत्र प्रक्षेपित चैतन्य सामान्य व्यक्तिको सहन नहीं होता । इसलिए सामान्यजनोंको गर्भगृृहमें प्रवेश नहीं दिया जाता । ५० प्रतिशत स्तरके जीव यदि गर्भगृहमें प्रवेश करें, तो वे देवतासे प्रक्षेपित चैतन्यका स्पर्श सह सकते हैं ।

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हिंदू धर्मकी परिपूर्णताका दर्शक
देवालयकी रचनाके सात स्तर
देवालयकी रचनाके सातों स्तरोंके घटकोंमें ब्रह्मांडके पंचतत्त्वोंमेंसे योग्य तत्त्व आकृष्ट करनेकी तथा दर्शनार्थीमें संबंधित चक्रकी शुद्धि करनेकी क्षमता होती है । देवालयकी रचनाके सात स्तर क्रमश: दर्शनार्थीके मूलाधारचक्रसे सहस्रारचक्र तककी शुद्धिकी यात्रा दर्शाते हैं । देवालयकी वैशिष्ठ्यपूर्ण संरचनाके कारण सातवें स्तर (निर्गुणसंबंधी आकाशतत्त्व)से पहले स्तर (सगुणसंबंधी पृथ्वीतत्त्व) अर्थात् देवालयके कलशसे प्रवेशद्वारतक, ईश्वरीय तत्त्वकी निर्गुण तरंगोंका रूपांतर सगुण तरंगोंमें होता है । अत: देवालयमें प्रवेश करनेवाले जीवको देवताके सगुण तत्त्वका अधिकाधिक लाभ होता है । दर्शनार्थीके लिए ईश्वरप्राप्तिकी दृष्टिसे हिंदुआेंके देवालयोंकी रचनाके पीछे कितना सूक्ष्म विचार किया गया है, यह उपरोक्त तथ्यसे स्पष्ट होता है । इस पृष्ठभूमिपर चर्च अथवा मस्जिदकी रचनाके पीछे इतना सूक्ष्म विचार नहीं दिखाई देता । इससे स्पष्ट होता है कि, अन्य पंथोंकी तुलनामें हिंदू धर्म कितना श्रेष्ठ व परिपूर्ण है ।'



टिप्पणी : देवताआेंकी स्थापना हेतु देवालयके गर्भगृहमें बना स्थान




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पिंडीके दर्शन करनेकी उचित पद्धति
शंृगदर्शन (नंदीके सींगोंसे शिवलिंगके दर्शन करना)

शृंगदर्शन - दाहिने हाथके अंगूठे व तर्जनीको नंदिके सींगोंपर रखकर शिवपिंडीके दर्शन करना

शंृगदर्शनकी योग्य पद्धति
नंदीके पिछले पैरोंके निकट बैठकर बाएं हाथको नंदीके वृषणपर रखें । दाहिने हाथकी तर्जनी (अंगूठेके निकटकी उंगली) व अंगूठा उसके दो सींगोंपर रखें । दोनों सींग व उसपर रखी दो उंगलियोंके बीचके रिक्त स्थानसे शिवलिंगको निहारें ।

शंृगदर्शनका भावार्थ : नंदीके वृषणको हाथ लगानेका अर्थ है, कामवासनापर नियंत्रण रखना सीखना । `सींग' अहंकार, पौरुष व क्रोधका प्रतीक है । सींगोंको हाथ लगाना अर्थात् अहंकार, पौरुष व क्रोधपर नियंत्रण रखना सीखना ।

शंृगदर्शनके लाभ
१. शिवपिंडीसे प्रक्षेपित तेज सह पाना : सर्वसामान्य व्यक्ति शिवपिंडीसे प्रक्षेपित तेजको सह नहीं पाता । नंदीके सींगोंसे प्रक्षेपित शिवतत्त्वकी तरंगोंके कारण जीवके शरीरके रज-तम कणोंका विघटन होता है तथा जीवकी सात्त्विकता बढती है । इससे शिवपिंडीसे निकलनेवाली शक्तिशाली तरंगोंको सह पाना जीवके लिए संभव होता है । नंदीके सींगोंसे दर्शन लिए बिना शिवजीके दर्शन करनेसे तेजतरंगोंके आघातसे शरीरमें उष्णता निर्माण होना, सिर सुन्न होना, शरीरमें अचानक कंपकंपी होना जैसे कष्ट हो सकते हैं ।

२. शक्तिका प्रवाह अधिक कार्यरत होना : `दाहिने हाथकी तर्जनी और अंगूठेको नंदीदेवके सींगोंपर टिकानेकी मुद्राके कारण श्रद्धालुआेंको आध्यात्मिक स्तरपर अधिक लाभ होता है । यहां ऐसा अनुभव हुआ कि, उक्त मुद्राके कारण नलीके समान कार्य होता है । नलीसे वायु प्रक्षेपित करनेपर उसका वेग व तीकाता अधिक होती है, इसके विपरीत पंखेकी वायु सर्वत्र फैलती है । इस मुद्राके कारण शिवपिंडीसे प्रक्षेपित शक्तिका प्रवाह अधिक कार्य करता है तथा शक्तिके स्पंदन संपूर्ण शरीरमें फैलते हैं ।' - कु. प्रियांका लोटलीकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.


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शिवपूजा


प्रत्येक देवताका एक विशिष्ट उपासनाशास्त्र है । इसका अर्थ यह है कि, प्रत्येक देवताकी उपासनामें प्रत्येक कृतिको विशिष्ट प्रकारसे करनेके पीछे एक शास्त्र है । उपासककी ऐसी कृति उस देवताके तत्त्वका अधिकाधिक लाभ प्राप्त करनेमें सहायक है । इस पृष्ठपर शिवोपासनांतर्ग कुछ नियमित कृतियोंकी उचित पद्धतिकी जानकारी दे रहे हैं । इस वर्ष ६ मार्चको शिवरात्रिपर शिवभक्त इसके अनुसार कृति कर अधिकाधिक शिवकृपा प्राप्त करनेका प्रयत्न करें ।

शिवपूजाके पूर्व भस्म लगाना
पवित्र रक्षाको भस्म कहते हैं । यज्ञमें अर्पित समिधा व घीकी आहूति जलनेके उपरांत जो भाग शेेष रहता है, उसे `भस्म' कहते हैं । जिस प्रकार भस्म नित्यकर्मोंमें आवश्यक है, उसी प्रकार यह शैव संप्रदायका अत्यावश्यक अंग है । भस्मधारण किए बिना शिवपूजा आरंभ न करें ।

रुद्राक्षधारण
शिवपूजन करते समय गलेमें रुद्राक्षकी माला अवश्य धारण करें । रुद्राक्ष धारण करनेवाला मद्य, मांस, प्याज, लहसुन इत्यादि निषिद्ध पदार्थोंका सेवन न करे ।

पिंडीकी पूजा
चौदहवीं शताब्दीसे पूर्व शंकरजीकी पिंडीको केवल जलसे स्नान करवाया जाता था; दूध व पंचामृतसे नहीं । चौदहवीं शताब्दीमें दूधकोे शक्तिका प्रतीक मानकर शैवोंने भी वैष्णव उपासनामें प्रचलित पंचामृतस्नान, दुग्धस्नान इत्यादि अपनाए । शिवपिंडीपर हलदी व कुमकुम चढाना निषिद्ध माना गया है । शिव पिंडीको भस्म लगाते समय पिंडीके दर्शनीय ओरसे भस्मकी तीन समांतर धारियां बनाते हैं या फिर समांतर धारियां खींचकर उनपर मध्यमें एक वृत्त बनाते हैं, जिसे शिवाक्ष कहते हैं । पिंडीका पूजन करते समय श्वेत अक्षतका प्रयोग करें । धतूरा, श्वेत कमल, श्वेत कनेर, चमेली, मंदार आक (मदार), नागचंपा, पुन्नाग, नागकेशर, निशिगंध, जाही, जूही, मोगरा तथा श्वेत पुष्प शिवजीको चढाएं । (शिवको केतकी वर्जित है, इसलिए उसे न चढाएं ।) बिल्वपत्रको आैंधे रख और उसके डंठलको अपनी ओर कर पिंडीपर चढाते हैं ।

पिंडीके दर्शन कहांसे करें ?
शिवजीसे प्रक्षेपित शक्तिशाली सात्त्विक तरंगें सर्वप्रथम नंदीकी ओर आकर्षित होती हैं, तदुपरांत वातावरणमें प्रक्षेपित होती हैं । विशेष यह है कि, ये तरंगें नंंदीके माध्यमसे आवश्यकतानुरूप प्रक्षेपित होती हैं । इस कारण पिंडीका दर्शन करनेवालेपर िशिवजीसे प्रक्षेपित शक्तिशाली तरंगें सीधे नहीं पडतीं; अर्थात् उसे तरंगोंसे कष्ट नहीं होता । ध्यानमें रखें कि, िशिवजीसे प्रक्षेपित तरंगें सात्त्विक ही होती हैं; परंतु सर्वसाधारण भक्तका आध्यात्मिक स्तर अधिक न होनेके कारण उसमें उन शक्तिशाली तरंगोंको सहनेकी क्षमता नहीं होती । इसलिए उसे इन तरंगोंसे कष्ट हो सकता है । अत: सर्वसाधारण भक्त िपिंडीके दर्शन करते समय पिंडी व नंदीके मध्यमें नहीं; अपितु पिंडी व नंदीको जोडनेवाली रेखाके समीप खडा रहे अथवा बैठे । (संदर्भ : सनातनका ग्रंथ - शिव)

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